जिंदगी एक ऐशट्रे हो गयी।
रोज पीता हूँ और बुझा देता हूँ ।
एक आग जो लगी है
वो बुझती नही ,रोज ही बढ़ती है ।
न जाने कितनी खामोशिया सिसक रही है
इस राख में अभी भी ।
एक दिन तूफान आये और राखो को उड़ा ले जाये
और बिखेर दे नदियों ,झरनों और खेतों में ।
जिंदगी का अंतिम कस लू और मुस्कुराता देखता रहूँ
इन सन्नाटो में बिखरे हुए जीवन को ।
न प्रेम न घृणा न नफरत न बंधन न रिश्ते
न बेचैनी न खोने का डर न पाने की चिंता।
बस तुम और में और मेरी अंतिम विदाई ।
मैंने अभी देखा नही है तुम्हे गौर से
पर जानता हूँ तुम मुझे लेने जरूर आओगी एक दिन ।
उस दिन खामोशी के साथ चल दूंगा तेरे साथ ।
बस कुछ निशानिया पीछे छूट जाएगी
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